गद्य खंड - पाठ 5: गलता लोहा (संपूर्ण हल)
लेखक: शेखर जोशी | NCERT Class 11 Hindi Solutions
1. कठिन शब्दार्थ (Word Meanings)
| पुरोहिती: | पूजा-पाठ करने का पेशा। |
| मेधावी: | बहुत बुद्धिमान (Intelligent)। |
| धौंकनी: | आग सुलगाने के लिए हवा फूंकने वाला यंत्र। |
| प्रतिद्वंद्वी: | मुकाबला करने वाला (Rival)। |
| निहाई: | लोहे का वह भारी टुकड़ा जिस पर रखकर लोहा कूटा जाता है। |
"मोहन के व्यक्तित्व का वह हिस्सा जहाँ जातिगत गर्व पिघलकर एक नए मानवीय कौशल में बदल जाता है, वही 'गलता लोहा' है।"
2. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Complete Q&A)
प्रश्न 1: 'गलता लोहा' कहानी के अंत में मोहन के व्यक्तित्व में क्या बदलाव दिखता है?
उत्तर: कहानी के अंत में मोहन अपनी ब्राह्मण जाति के अहंकार को त्यागकर धनराम लोहार के साथ काम करने लगता है। वह न केवल लोहे को सही आकार देता है, बल्कि उसकी आँखों में एक सृजक की चमक होती है। यह बदलाव दर्शाता है कि कौशल और मेहनत जाति की सीमाओं से ऊपर है।
प्रश्न 2: मास्टर त्रिलोक सिंह मोहन को लेकर क्या उम्मीदें रखते थे?
उत्तर: मास्टर त्रिलोक सिंह को मोहन पर बहुत भरोसा था। वह पढ़ने में बहुत तेज और मेधावी था। मास्टर जी अक्सर कहा करते थे कि "मोहन एक दिन इस स्कूल का और मेरा नाम रोशन करेगा।" वे उसे स्कूल का मॉनिटर भी बनाकर रखते थे।
प्रश्न 3: रमेश मोहन को शहर क्यों ले गया और वहाँ मोहन के साथ कैसा व्यवहार हुआ?
उत्तर: रमेश मोहन को शहर इसलिए ले गया ताकि वह आगे की पढ़ाई कर सके, लेकिन शहर पहुँचते ही स्थिति बदल गई। रमेश के घर वालों ने मोहन को एक छात्र के बजाय घरेलू नौकर बना दिया। उससे घर के छोटे-मोटे सारे काम कराए जाते थे, जिसके कारण उसकी पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो गई।
प्रश्न 4: धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं समझता था?
उत्तर: इसके दो कारण थे: पहला, मोहन पढ़ने में बहुत तेज था और मास्टर जी का चहेता था। दूसरा और सबसे प्रमुख कारण था 'जातिगत संस्कार'। धनराम को बचपन से ही यह सिखाया गया था कि ब्राह्मण जाति के लोग श्रेष्ठ होते हैं, इसलिए उसने कभी भी मोहन के साथ अपनी बराबरी या मुकाबले के बारे में नहीं सोचा।
प्रश्न 5: "वन्शीधर का सपना टूट गया"—इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर: वंशीधर (मोहन के पिता) चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बने और उनकी गरीबी और पुरोहिती के कठिन जीवन से छुटकारा दिलाए। लेकिन जब मोहन शहर से वापस आया और अंत में लोहार के काम में हाथ बँटाने लगा, तो वंशीधर को लगा कि उनकी सारी उम्मीदें और संघर्ष मिट्टी में मिल गए हैं।